सिद्धार्थनगर में ‘सरकारी पेड़’ पर ‘अवैध आरा’: जांच की धीमी चाल और अधिकारियों की संदिग्ध भूमिका!
नहर किनारे सरकारी पेड़ की बलि, फॉरेस्टर के 'झूठे दावों' ने खोली विभाग की मिलीभगत की पोल! सिंचाई विभाग की जमीन पर डाका: जिम्मेदार विभाग मूकदर्शक, ग्रामीणों में भारी रोष!
अजीत मिश्रा (खोजी)
सिद्धार्थनगर: सरकारी पेड़ों पर ‘अवैध आरा’, विभाग की चुप्पी और जिम्मेदार अधिकारियों की संदिग्ध भूमिका!
- सिद्धार्थनगर में पर्यावरण पर प्रहार: प्रशासन की नाक के नीचे से सरकारी पेड़ गायब, अब जांच का ढोंग!
- पेड़ कटान का सच छिपाने की कोशिश: क्या वन विभाग और भू-माफियाओं की जुगलबंदी ने काटी हरियाली?
सिद्धार्थनगर। उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर जिले में सरकारी संपत्ति को लूटने और सरकारी जमीन को खुर्द-बुर्द करने का एक ऐसा शर्मनाक मामला सामने आया है, जो प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवालिया निशान खड़े करता है। मोहाना क्षेत्र में धनगढ़वा-भगवानिया नहर किनारे खड़ा एक पुराना और बेशकीमती कर्मा का पेड़ न केवल अवैध रूप से काट दिया गया, बल्कि जिम्मेदार महकमे इसे बचाने के बजाय उसे ‘निजी’ साबित करने की जद्दोजहद में जुटे रहे।
साक्ष्य गवाह, पर अफसर ‘अंधे’
घटना 17 जून की है, जब लालपुर चौकी के समीप सिंचाई विभाग की जमीन पर खड़े इस हरे-भरे पेड़ को काट गिराया गया। तस्वीरें चीख-चीख कर सच बयां कर रही थीं कि पेड़ नहर के बंधे पर है, जो स्पष्ट रूप से सिंचाई विभाग की संपत्ति है। लेकिन, सबसे चौंकाने वाली भूमिका वन विभाग के फॉरेस्टर शैलेंद्र कुमार यादव की रही। उन्होंने बिना किसी पड़ताल के मौके पर ही पेड़ को ‘निजी जमीन’ का बताकर मामले को रफा-दफा करने का कुत्सित प्रयास किया।
सवाल यह है कि आखिर एक जिम्मेदार वन अधिकारी किसकी शह पर इतनी बड़ी झूठ बोल रहा था? क्या यह मिलीभगत का एक हिस्सा था, या फिर सरकारी पेड़ों की बलि देने वाला कोई बड़ा सिंडिकेट जिले में सक्रिय है?
नींद से जागा प्रशासन
जब तक मीडिया ने इस मुद्दे को जोर-शोर से नहीं उठाया, तब तक सिंचाई विभाग कुंभकर्णी नींद में सोता रहा। खबर प्रकाशित होने के बाद अब एसडीओ मालविका जैसल जांच का आश्वासन दे रही हैं। लेकिन, 17 जून की घटना और आज 22 जून के बीच का यह पांच दिनों का अंतराल क्या किसी बड़ी साजिश की ओर इशारा नहीं कर रहा? क्या इस देरी का उद्देश्य पेड़ों की लकड़ियों को ठिकाने लगाना और सबूतों को मिटाना था?
वन विभाग की भूमिका संदिग्ध, निष्पक्ष जांच की दरकार
ग्रामीणों का आरोप है कि नहर की सफाई की आड़ में इलाके में पहले भी कई पेड़ों की बलि दी जा चुकी है। स्थानीय लोगों में आक्रोश है कि आखिर किस आधार पर वन विभाग के फॉरेस्टर ने गलत रिपोर्ट दी? क्या उनके खिलाफ कोई विभागीय कार्रवाई होगी, या फिर इसे भी एक सामान्य चूक मानकर दबा दिया जाएगा?
सिद्धार्थनगर प्रशासन को यह समझना होगा कि सरकारी संपत्ति पर डाका डालने वालों का मनोबल तभी टूटेगा जब कड़े प्रशासनिक कदम उठाए जाएंगे। इस मामले में केवल पेड़ कटने की जांच नहीं, बल्कि फॉरेस्टर शैलेंद्र कुमार यादव के विरोधाभासी बयानों और उनकी कार्यशैली की भी गहनता से जांच होनी चाहिए।
क्या जिले में पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी अब लकड़ी माफियाओं के हवाले कर दी गई है? प्रशासन को जल्द ही इस सवाल का जवाब देना होगा, अन्यथा आम जनता का कानून और तंत्र पर बचा-खुचा भरोसा भी उठ जाएगा।







